मंजिल पाना भी कैसी त्रासदी है!!!!! ज़िन्दगी का पूरा पहला पड़ाव बस ये सोचने , जानने , समझाने, पाने में खो दिया की : मंजिल है कहाँ!!!!! पर मंजिल कोई सागर किनारे बसा सहर नहीं जैसे मुंबई और चेन्नई जहाँ स्टेशन नहीं होते..... टर्मिनल्स होते हैं...... जहाँ से आगे पटरी नहीं जाती..... कहीं भी नहीं....
पर ज़िन्दगी की पटरी आगे जाती है.... जाना चाहती है..... आगे रास्ता नहीं है ये सोच के उसे मंजिल मान लेना भी एक तरह की कुप्मंदुकता नहीं है क्या?????? आज लगता है की ये कुछ वैसा ही जब ये खोज नहीं हुई थी पृथ्वी गोल है या चोकौर.... तब एक किनारे पर पहुंचे और बस मान लिया उसे मंजिल....... जब ये भी नहीं पता था की ग्रुत्वाकर्षण किस चिडयाँ का नाम है.... तब लोग बस यूँ ही चिपके रहते थे..... परिवार से, समाज से... इस दर से कहीं दूर गए और गिर ना जाये इस धरती से..तब पता कहाँ था की धरती इतनी आसानी से गिरने कहाँ देगी ......
ना जाने क्यूँ आज मंजिल को सफलता से नहीं परिभाषित करने का मन करता है..... आज मंजिल रास्ते का अंत लगती है मुझे.... आज कुछ दिन पहले Facebook पर एक फ्रेंड (पतिनकर प्रमोद) का लिखा एक कमेन्ट याद आ रहा है " एवेरी एक्स्प्लोरेड हस सम Unexplored थिंग"..... कितना सच है..... पर बात वहीँ आके ख़तम हो जाती है ना.... की जो एक बार मिल गया ,वो मिल गया.... रास्ता ख़तम ..... मंजिल मिल गयी..... अब ...???? अब क्या अब बेठ के अपनी सफलता की डिंग हांको.... और अगर ये नहीं कर सकते तो बस भजन गाइए..... और अगर वो भी नहीं कर सकते तो ब्लॉगर तो फॉर sure बन सकते हैं......
क्या हर मंजिल को एक ही रास्ता जाता है???? क्या एक ही चीज़ को अलग नज़रियों से देखना गलत है ???? क्या एक ही मंजिल को दो बार टटोलना वक़्त की बर्बादी है????? ये प्रश्न मुझे यक्ष प्रश्न से लगते हैं .....
पर ज़िन्दगी भी बड़ी भ्रमित करती है..... पहले सारी सकारात्मकता से चलना सिखाती है और फिर जब घुटने घुटने चल के इंसान चलना सीखता है ....तो उसे रोक देती कह के....अब क्यों चलना पहुँच तो गए????? चलने से पहले मंजिल तय तो थी पर ये तो नहीं तय था की मंजिल के बाद चलना ही नहीं है..... ये भी तो हो सकता है जिसे हम मंजिल मान रहे हैं वो बस एक मिल का पत्थर हो..... बिना चले कैसे जान लूँ...मान लूँ की ये रास्ते का पत्थर है या मंजिल????
सच कहूँ तो मंजिल कुछ है ही नहीं सिवाय एक पड़ाव के ...... अब ये पड़ाव छनिक है या सर्वदा के लिए ....ये तो सायद इन्सान की सोच पर ही निर्भर करती है.........
मेरी राय मे तो मंजिल होना एक त्रासदी है.................
You are jst awsm yaar :)
ReplyDeleteDimag ki batti jal gayi padhkar....
anythng serious babu....???
Bsns to apna achha chal raha hai...den wats all dis manzil thng... is der smthng u wanna say...den plz dnt hesitate....:)
Nthng serious....:D
ReplyDeleteChill!!!
Its nt abt bsns or success.... its about how you feel about greed of success and hw one can knw whr u hv to say yesss its d end or smthng like dat or may b i m thnkng too much nw a days .... aise hi!!! janta hai naaa!!!
and plz hum pehle bhi bole hain dat i have a very gud name use dat .... no need f usng all des adjectives like babu ,sweetu and ol... i dnt like it... :) ....
and tujhse aur hesitation ... huh!!! chehra dekh apna mirror main!!!