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Saturday, March 24, 2012

बात की तलाश जारी है

तुम...मैं... हम.. सब कितना उलझा हुआ है ना?? हम एक बात कहते हैं और उससे जुड़ी हज़ार बातें निकल जाती है और इन सबमे हम हमेशा असली बात से बहुत आगे निकल जाते हैं.... वो बात बस एक याद बनकर रह जाती है... आधे पूनम की रात को इश्क की गीली मिटटी से बने आधे सलोने चाँद को देखते हुए उठने वाली एक आह वाली याद...  मैं उस याद को जीना चाहती हूँ। सच्ची !! फिर से एकदम वहीँ शुरू से जंहा से बात की शुरुवात हुई थी... वहीँ कहीं से ... पर यादों से निकल ये बात कब कहाँ गम हो जाती हैं  ....मुझे कुछ पता ही नहीं चलता ... कभी भी नहीं... शुरू से ऐसी ही हूँ, बिलकुल बेफिक्र!! अपने और अपनी चीज़ों के बारे में... सोचती हूँ बचपन से ही एक फोल्डर में यादों को सिलसिलेवार अगर संजो के रखती तो यूँ आज इत्ती तो परेशानी नहीं होती.....


अरे!!! "तुम मेरी बेस्ट फ्रेंड हो " ये थी क्या वो बात .....
नाआआआ ..... ये तो उसने बहुत शुरू में कभी कही थी ...
तो फिर जरुर ये वाली होगी की "तुम ना एकदम पागल हो !! बड़ी वाली "
नहीं ये भी नहीं ..... ये वाली तो उसने कुछ दिन पहले ही कही थी...
फिर वो है क्या एकदम ऊपर वाले ड्रावेर में पीछे छुप के जो बात पड़ी है की "तुम मुझे बता सकती हो की सही क्या है और गलत क्या??? ह्म्म्म बोलो "
ये भी नहीं है...


अरे तो अब मुझे माफ़ करो !! मुझ्शे नहीं होती ये खोज बीन वो भी तुम्हारे इस बिना रौशनी के धुल भरे आवाजघर में.... तरह तरह की आवाज़ भरी पड़ी है यहाँ... कोई कब तक सुने इस अँधेरे कमरे में तुम्हारे खाली दिमाग के घंटाघर को.... टन टन का शोर मचाती हैं ये आवाजें.... क्या धुंडने चली आती हो यहाँ... बार बार... हर बार... कुछ नहीं रखा अब यहाँ.. सुंनो! एक बात मानो वो बात खो चुकी है..... भूल जाओ उसे.....


धुल, अँधेरा ह्म्म्म देखो ये तो है ... पर अगर तुम मेरी नज़रों से देखोगी तो तुम्हे ये जगह किसी खजाने से कम नहीं दिखेगी.... यहाँ लगभग हर वो आवाज़ है , जिसने मेरी ज़िन्दगी को कभी छुआ है... किसी भी रूप में.... वो जो एकदम ऊपर में सबसे धुल भरी दराज़ है... जिसकी हैन्दिल्स बड़े चमकदार हैं....उसमे मेरी और  मेरी माँ की बातें सहेजी हुई हैं...मेरे हॉस्टल के दिनों में मैंने सबसे ज्यादा उसी दराज़ को सुना है.... और वो जो है ना कोने में पतली सी एक ड्रावेर उसमे तुम्हारी  और मेरी यादें ज़ब्त हैं.... और वो जो उस कौने  में एक मोटी  सी दराज़ है ना उसमे वो बातें हैं जो मैं खुद से करती हूँ.....  जानती हो ये बातें ही तो हैं मेरी खुशियों का राज़... मेरी कभी ना ख़तम होने वाली मुस्कान और उत्साह का एवर लास्टिंग सौर्स... देखो नज़र मत लगाना... पर देखो ना सब बातें हैं...बस वो ही नहीं है....


तुम कहती हो उसे भूल जाने को.... पर...कैसे समझाउं उसे की भुलाने की लिए पहले याद आना बहुत जरुरी है... और याद के लिए उस बात का होना उससे भी ज्यादा जरुरी है.... बात!!! अरे हाँ !! वो बात... ह्म्म्मम्म






बात की तलाश जारी है !!! 











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