(१)
किताबों के पन्नों से नहीं टपकती ज़िन्दगी...
की धुल भरे कवर के भीतर
रचे मुर्दा किरदार ,
कब तक
संवारेंगे किस्मत
जिंदा इंसानों की...
(२)
खिड़की पे निकला है
बल्ब सा चमकता सूरज
बस इत्ती सी रौशनी से
जगमगाती है मेरी पूरी दुनिया...
(३)
ना जाने कैसी
भागमभाग है की
इत्ते से बस्ते में
सबने समेट ली है
अपनी-अपनी
दुनिया...
(४)
पुरे दिन का टोनिक चाहिए
इसलिए सुबह-सुबह ही
साँसों तक में
भर लेती हूँ
माँ
तेरी आवाज़...
(५)
किताबों के पन्नों
के बाहर
भागती- दौड़ती
सड़कों
पर दीखते हैं
रोज़ नए किरदार
(६)
ज़िन्दगी के कोलाहल में
जब खोने लगूँ
खुद, अपनी ही आवाज़
हो सके तो
तब मुझे कुछ
मेरा कहा सुना देना...
(७)
मैं कहाँ हूँ ?
रोज़ निकलती हूँ
अपनी तलाश में...
की अब तो
कहानियों वाला बूढ़ा बाबा
भी नहीं आता...
(८)
किसी खिड़की से लटका
उदास चेहरा,
वैसा ही लगता है
जैसे
खेल के मैदान में,
अकेला खड़ा
खामोश बच्चा...
(९)
सुबह सुबह आँख खुल
जाती है
आजकल
की
ये भी समझ गयी हैं
की सपनों से यारी
अच्छी नहीं..
(१०)
यूँ तो सब
समझाता है...
मेरा मन
पर
ये कमबख्त 'पर'
बोलना नहीं छोड़ता...
(११)
ज़िन्दगी जब उदासी
का दामन पकडाए
तो
थाम लेना उसे भी
मुस्काते हुए...
(१२)
कभी-कभी
सोचती हूँ
की ज़िन्दगी
बोर नहीं होती होगी
खुद के बारे में
इत्ती बातें सुनकर.....
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(११)
ज़िन्दगी जब उदासी
का दामन पकडाए
तो
थाम लेना उसे भी
मुस्काते हुए...
(१२)
कभी-कभी
सोचती हूँ
की ज़िन्दगी
बोर नहीं होती होगी
खुद के बारे में
इत्ती बातें सुनकर.....
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