डिस्क्लैमेर: ये पोस्ट मैंने नींद ना आने वाली स्टेट में पुरे पागलपन में लिखी है... इसे आप अपनी रिस्क पर पढ़ रहे हैं... इसमें कोई काम की बात नहीं है... इसलिए आप इसे पढना स्किप भी कर सकते हैं!
रतजगे का सोचना... इसे आधी रात का जागना भी कह सकते हैं... नींद यूँ भी मेरी हमेशा से बहुत कम रही है.. ४-५ घंटे सदा मोर देन सफिसेंत लगे हैं मुझे... स्कूल से ही बहुत सारा पढने की आदत थी.... सो पहले सिलेबस की किताबें पढ़ती थी ११ बजे तक फिर दो- तीन घंटे कुछ अपनी मर्जी से पढना और साथ ही मन को एक और बुरा शगल था बहुत कुछ सकेर लेने का... मुझे याद है, मेरे पहले इंटरव्यू में मुझ्शे पुछा गया था की इतना सब करने को वक़्त कहाँ से निकाल लेती हो... मेरा जवाब था " आई स्लिप लेस"... अब उसे क्या बताती की कम सोने का मतलब ये है की लड़की नींद में भी सोचती है... वैसे मुझे आज भी बिना पढ़े नींद नहीं आती...
कॉलेज में आकर तो हालत और भी खराब हो गयी... एक ही सेमेस्टर में इत्ता सिलेबस होता था और उसपर इतना सुन्दर रीडिंग रूम था की क्या कहें वहां से निकलने का मन ही नहीं होता था... एक सीक्रेट बताये हमने ना कॉलेज लिबरेरी को पूरा पढने का प्लान बनाया था अपनी दोस्त के साथ ... खैर वो पूरा नहीं हो सका... तीन साल इतना भी लम्बा वक़्त नहीं होता... कोल्कता जाकर तो हालत और बिगड़ गयी... हाँ वहां मेरी नींद में बहुत बदलाव हुए... पर पढने और लिखने में कोई कमी नहीं आई.... वहां जाकर मैंने पूरी रात ना सोना और दिन भर पढना ये एक बहुत अच्छी चीज़ भी सीखी... तीन -चार बजे तक पढ़ते हुए जागना वहां नोर्मल रूटीन बन गया था...
जानते हैं यूँ मुझे पढना, अपनी डयरी में या ब्लॉग में लिखना बहुत अच्छा लगता है... पर यूँ आधी रात को जब कुछ यूँ बेकार की अलाय-बलाए सुनाती हूँ तो समझ लीजिये की मैं खुद को यकीं दिलाना चाहती हूँ की हाँ! दुनिया में तुम्हारे एह्शाश अब भी जिंदा हैं... ऐसे किसी वक़्त मन में एक टीश सी उठती है... मैं अपने बहुत प्यारे दोस्तों को फ़ोन मिलाना चाहती हूँ... और सुना देना चाहती हूँ उन्हें अपने मन में उठने वाले हर ख्याल, चाहे वो कितने ही बेतुके क्यों ना हो... मैं चाहती हूँ उनसे पूछना की क्या वो भी मुझे कभी यूँ याद करते हैं ऐसे आधी रात को...पर मैं जब बात करती हूँ ना तो मुझ्शे वो रश्मि बातें " कैसी हो? क्या हुआ? " नहीं करनी आती... मैं बात करती हूँ तो बिलकुल अपने अंदाज़ में... जिसके लिए वक़्त चाहिए कम से कम दो घंटे... वरना लगता ही नहीं की बात भी किए हैं... इसलिए किसी को रात में सिर्फ अपनी बेतुकी बातें सुनाने के लिए फ़ोन नहीं करती... वैसे भी कहीं पढ़ा था की ' दुनिया में दोस्ती ही ऐसा रिश्ता है जिसमे सबसे ज्यादा हक होता है और सबसे कम अधिकार "... इसलिए सोचती हूँ की कैसा लगे अगर मैं किसी दोस्त को हक से फ़ोन करूँ और वो कह दे की तुम्हे इसका कोई अधिकार नहीं... तो फिर?? सह पाओगी की क्या उसे लड़की... नहीं ना... इसलिए अच्छा है ब्लॉग पर आओ.. गीत पित करो और फिर अगले दिन उठो और निकलो ऑफिस के लिए... समझी...
मुझे लिखे बिना भी चैन नहीं आता... मुझे कई लोग हज़ार बार समझा चुके हैं की हर बात लिखनी नहीं चाहिए...कुछ बातें मन में भी रखनी चाहिए... ऐसा ही लोग बोलने के बारे में भी कहते हैं की... कभी शांत भी रह लेना चाहिए... पर मुझ्शे नहीं रहा जाता... जो कहना सो कहना है... अगर नहीं कह सकते तो लिख देंगे... ऐसा लगता है जैसे जब तक जो बातें अंदर घूम रही हैं उन्हें बाहर नहीं आने दिया, तो चैन नहीं मिलेगा... शायद यूँ ही आधी आधी रात को लिखती रहूँ...
ऐसे ही किसी आधी रात के बेचैन लम्हे में मैंने मयंक से कहा था 'रिएतिंग इस अ कर्स टू मी'... कितना डांटा था उसने... कभी भूल के भी मत बोलना ऐसे... काश मैं भी लिख पाता तेरे जैसे... बहुत दिन हो गए उससे बात किए... प्रोजेक्ट के बाद तो हम दोनों अपनी प्रिओरितिएस मी इत्ते बिजी हुए की कभी चैन से बात ही नहीं कर पाए... देखो कब फुर्सत मिलती है जनाब से बात करने की... वैसे भी आपके जिन दोस्तों के गर्ल/बॉय फ्रेंड हैं उन्हें तो आप रात को कॉल नहीं कर सकते ना... :(
शायद मैं आजकल बहुत आत्मकेंद्रित होती जा रही हूँ... मुझे अपने से अलग लोग समझ ही नहीं आते... ये जो कुछ लोग हैं जिनसे मेरी दुनिया सजती हैं... कुछ आम से ही लोग हैं पर अगर कभी मुझ्शे सुनेगे उनके बारे में तो आपको लगेगा की इनसे ज्यादा कोलौर्फुल और खुबसूरत लोग आपने कहीं नहीं देखे... खैर उनकी बातें फिर कभी सुनाउंगी.... फिलहाल के लिए तो इतना लिखा इतना चैन दे रहा है की चार पांच घंटे की नींद का सौदा किया जा सकता है... तो इससे पहले की मेरा मन कोई और खुराफात सोचे... हम चले सोने... :)

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