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Wednesday, July 04, 2012

ज़िन्दगी से गुफ्तगू

रोज़-रोज़
मुस्कानों की खनखनाहट के बदले                                  
खरीद लाती हूँ...
बित्ते भर परेशानी,
चुटकी भर सोच,
मुट्ठी भर ख्वाब,
दो आंगुल की जुबान...
और  
कभी न ख़त्म ना होने वाली 
जिजीविषा...
वहीँ मोड़ वाली 
ज़िन्दगी की दूकान से...

                                                                              
टुकुर टुकुर
क्या देखती है वो मुझमे?
ना जाने क्या सोचकर
दे दिया करती है
छोटा सा डिस्काउंट
हर खरीददारी पे...
की कभी कभी तो
बिना कुछ ख़रीदे भी
पिला देती है
मुफ्त की चाय...

सोचा की
पुछ ही लिया जाए
राज़ इस मेहरबानी का...
हमने कहा
ऐ ज़िन्दगी!
क्यों देती हो हमे
ये खाश इंतज़ाम...

ज़िन्दगी ने ज़वाब दिया
"मतलबी दुनिया में
बिन मतलब के ज़ीने की
जो गुस्ताखी हमने कर...
जिलाए रखा है
उसके वजूद को..
बस उसका
शुक्रिया,

वो यूँ किया करती है...."

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