सुनती हूँ संसद तक पहुंची है उसकी आवाज़पर कहाँ थे लोग, जब वो दर्द से चीख रही थी।
पूछते हैं क्या कर रही थी वो देर रात बस में
क्या किसी ने पुछा यही सवाल उन हैवानो से?
मुद्दा ये नहीं होना चाहिए की फाँसी हो की नहीं
मुद्दा तो ये है की क्या बस फांसी होगी?
जरुरत सिर्फ सख्त कानून की ही नहीं है
बदलाव चाहिए।समाज में।घरों में।सोच में।
सब के लिए ये बस कुछ दिन का खेल है
कोई बड़ी नई ब्रेकिंग न्यूज़ आने तक तुम्हे याद रखेंगे।
एक फेसबुक अपडेट या ट्वीट या ब्लॉग तक की नैतिकता है
गलती से भी मत सोचना की उनकी नज़रों में सम्मान मिलेगा।
सुन तू डर मत अब, सरकार ने सख्त कदम उठाये हैं
तो क्या बसों में केमरें नहीं लगे पर अब काले कांच हट जायेंगे।
ऐ लड़की दर्द तू सह रही है, आगे भी सहना है ये जान ले।
भारत है ये, यहाँ इज्ज़त को सिर्फ योनि से जोड़ा जाता है।
हाथ में मोमबत्ती ले पूरी दिल्ली उमड़ी है जनपथ में
कहाँ थे वो हाथ जब वो निर्वस्त्र घंटों सड़क पर पड़ी थी?
मुझे नहीं पता की कौन दोषी है सरकार या समाज?
मैं बस इतना जानती हूँ की वो बेक़सूर थी।
विदेशी डॉक्टर जोड़ देंगे शायद तेरी टूटती साँसों की डोर
नहीं जानती पर देशी समाज तुझे कितना जीने देगा?
सब जान-समझ कर दूँ तुझे जीने की दुवाएं
इतनी इंसानियत मुझमे कभी थी ही नहीं।
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