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Sunday, January 13, 2013

एक शाम बुकमार्क

किताबों की दूर तक जातीं कतारें . उन्हें बस यूँ ही देखना, गुज़रना उनके सामने से, कैसे तो कितना सुकून दे रहा था। दूर तक फैले मैदान में बस जहाँ नज़रें जाएँ वहां बस किताबें ही किताबें ... कितने किरदार सर निकाल कर झाँक रहे थे, कुछ ने तो हाथ ही पकड़ लिया, कुछ गुमसुम से मुह फुलाए बेठे थे, कुछ जाने- पहचाने चेहरे, कितने पक्के वाले दोस्त, कुछ हमेसा वाले दुश्मन ...
किताबें यूँ ही ढूंढती हैं मुझको...हाथ पकड़ पर रोक लेती हैं...आग्रह करती हैं कि मैं पन्ने पलट उन्हें गुदगुदी लगाऊं...फिर कुछ किताबें ऐसी होती हैं कि उँगलियाँ फिराते ही खिलखिलाने लगती हैं...कुछ हाथ से छूट भागती हैं, कुछ गुस्सा दिखाती हैं और कुछ बस इग्नोर करना चाहती हैं...तो कुछ किताबें ऊँगली पकड़ झूल जाती हैं कि मुझे घर ले चलो...तब मुझे अवनी याद आती है... वो भी  ऐसे ही हाथ पकड़ के झूल जाती है कि मौसी मुझे बाज़ार ले चलो. मुझे वैसे भी किताबों का अहसास हाथ में अच्छा लगता है...लगता है कि किसी अनजान आत्मीय व्यक्ति से गले मिल रही हूँ...जिसने बिना कुछ मांगे, बिना कुछ चाहे बाँहें फैला कर अपने स्नेह का एक हिस्सा मेरे नाम कर दिया है. 

पुस्तक मेला लगा है ,घर के पास में...उतनी सारी किताबों को एक साथ देखना ऐसा लगता था जैसे घर में शादी-त्यौहार पर सारे रिश्तेदार जुट आये हों...कुछ दूर के जिनसे सालों में कभी एक बार मिलना होता है...कितना कुछ तो ऐसे ही देख के खुश हो लिए भले ही किताब न ख़रीदे ... किताबों को देख कर...छू कर खुश हो गए . किताबों का ख़ुशी के साथ एक धागा जुड़ गया था याद नहीं कब से ... 

हाँ तो हम आज ब्लाइंड डेट पर निकले थे, किसी नए म्यूस की खोज में। और क्या कब तक रेट बटलर के साथ कॉफ़ी डेट पर जाएँ। कोई और भी हो जिसे रोरक से ज्यादा प्यार कर पायें। कोई और जिसपर हैरी से ज्यादा ट्रस्ट कर पाऊं। पर ये क्या? कितनी ही देर नज़र फिसलती रही...कोई अपना न दिखा...किसी ने आवाज़ नहीं दी...किसी ने हाथ पकड़ के रोका नहीं...मैं उन किताबों  के बीच में तनहा खड़ी थी...ऐसे ही ध्यान आया कि मोबाईल शायद साइलेंट मोड पर है...उसे देखा तो लाल बत्ती जल रही थी...फेसबुक पर देखा तो कुछ दिलफरेब पंक्तियाँ दिख गयीं..

दो आँखें सालों से सोयी नहीं है
कोई इंतज़ार की जगह नींदें रख दो इन कटोरों में ..."

और जैसे की दूर शब्दों के जाल में उलझी ये पंक्तियाँ मन को उलझाने को कम थी की पूजा ने सुन ली कहीं से आती एक आवाज़ " तुझे मैं धुन्दता फिरूँ"... बस फिर क्या सारी किताबें रूठ गईं ...  पर कोई नहीं, मना लूंगी किताबों को...बचपन की दोस्ती में डाह की जगह नहीं होती. 


हल्की ठण्ड, दोस्ती की गर्माहट, किताबों का सुकून, फरमाइशी गाने, हाँ! और बोर्नविटा ज़िन्दगी में खुश रहने के लिए शायद ज्यादा कुछ की ज़रूरत होती ही नहीं। एक शाम जहाँ सब परफेक्ट था। जैसे अचानक से जिगसा पजल के सारे पीसेज खुद ब खुद बिलकुल सही जगह फिट हो गए। ज़िन्दगी की एक शाम हम बुकमार्क करते हैं ... सजाने को ज़िन्दगी का कोलार्च।

तुम्हारा ढेर सारा शुक्रिया मेरी ज़िन्दगी को खुशियों वाली कलम से सजाने के लिए ...

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