वो बड़ी अजीब सी लड़की थी... वो बिखेरती चलती थी धुप, हवा, खुशबु...वो उँगलियों से खड़े करती पहाड़ और फिर खींच देती उनमे नदियाँ... वो काले बादलों से ढक देती आकाश, फिर बनाती उनमे बिजली की अल्पना...चुप शांत सड़कों पर ला देती बिन मौसम का पतझड़ और धुंद की एक-आधी लकीर... वो चुरा लेती नमकीन आंसूं दोस्तों की आँखों से और खड़े करती नमक के अभेद्य किले... वो इशारों से बुलाती थी बसंत,उसके जुड़े में बंधे थे सारे रास्ते, उसकी लटों में उलझे थे कितने ही शहर... वो पलकों पर लिए फिरती थी ख़ुशी, मुस्कानों का सौदा करती थी रंगों से... वो खेलती थी सुरों से, की वो सारे उसके दोस्त थे, .षडज, रिषभ, गन्धर्व, मध्यम, पंचम, धैवत, निषाद.. सभी। उसके पदचापों पर अटका था सूरज का दिल, धरती भी उसकी ही धुरी पर घुमती थी... कितने ही सितारें अटके पड़े थे उसकी बालियों में, चाँद का सिक्का ढलवा रखा था उसने... वक़्त भी उसके नैनों के नशे में कैद था, उसकी क्षमता अद्भुत थी कहानियों से लोगों को आने का संदेसा भेजती,कितनों को देती थी सजा कालापानी की कैद कर किसी कहानी में... नीम नींद में रखती है ख्वाब आँखों के कटोरों में,एक कतरा ज़िन्दगी की सौगात तकिये किनारे छोडती है वो...
सपनों की सौदागर है वो या ज़िन्दगी। शायद दोनों... सच और सपनों में कोई लकीर कहाँ खीचीं रहती है...
वो अपने शब्दों से रचती है एक पूरी दुनिया, एक कागज़ का टुकड़ा और थोड़ी सी सियाही बस इसकी ही ज़रूरत है उसे, शायद इसकी भी नहीं, पूरी धरती, उसका कोरा बदन सब पर उकेड़ देती वो अक्षर, जो ना मिलती सियाही वो आंसुओं की गंगा बहाती, जो आंसूं भी चुप हो जाते, तो वो काट देती अपनी धमनियों को नज़र-बाण से, लड़की को ना जाने क्यूँ ये यकीं था की उसकी शिराओं में खून नहीं सियाही बहती है।उसकी मज्जाओं में शब्द उकेड़े हुए हैं।
लिखना जरुरी था। क्यों? वो खुद भी नहीं जानती... कोर कागज़ उसे यूँ खिचता था मानो उसका प्रीतम हो, लिखा हुआ उसे और लिखने को उकसाता। वो छुपा देती कलम, आग लगा देती कागजों में, पर उसे लिखने के लिए किसी की जरुरत नहीं थी... वो आसमान में लिख देती एक नज़्म काज़ल से, फिर ना जाने कितने हफ्ते उस शहर में छाए रहते काले बादल। सड़कों पर छोड़ आती एक मतला धुल पर उँगलियों से रच, एक अनजान बेल उग जाती उस धरती से, जीवनबेल। हवाओं में टाकं देती एक ख़त मुस्कान से सील कर किसी अनजान अजनबी के लिए, सागरों में बहा देती कितने किस्से लहरों से गूँथ कर, उस सागर में ज्वार- भाटा भी डिसिप्लिन में आते फिर।
"हमें डर अपने अंधेरों से नहीं...अपने उजालों से लगता है...हम अपनी कमजोरियों से नहीं...अपनी अकूत क्षमताओं से डरते हैं."( सोर्स- अज्ञात)
ज्यों- ज्यों पन्ने भरते, लड़की रितती जाती। वो अपनी मुस्कान के बदले रंग भर देती किसी किरदार की ज़िन्दगी में, वो रंगों से खेलते हुए, कब खुद इन्द्रधनुष में कैद हो जाती उसे कुछ पता ही नहीं चलता। उसके किरदार इतना कोलाहल मचाते की वो खुद अपनी आवाज़ भूल जाती और फिर धीरे धीरे उसकी स्वर पहचानने की क्षमता घटती जाती ...एक एक करके उसके जीवन से सारे सुर लोप हो जाते हैं ...सबसे पहले गंभीर और अनुभवी षडज कहीं दूर चला जाता है. लड़की खुद को समझाती है कि उसकी उम्र हुयी...कौन जाने किसी दिन अलंकार के जंगल में रास्ता भटक गया और भूखा कोई ताल उसे खा गया हो. फिर एक दिन रिषभ भी ज़ख़्मी हालत में वीणा के नाद में गुम हो गया...अब लड़की को गन्धर्व की चिंता शुरू हुई...वो कहाँ गुम होयेगा? कैसे जाएगा? गन्धर्व उसका पसंदीदा सुर था... फिर एक दिन एक सन्नाटे का अंधड़ चला और लड़की के हाथ से दोनों गन्धर्व छूट गए...लड़की बहुत रोई...बहुत रोई. फिर उसने बाकी बचे सुरों को समेटा और उनसे एक राग बनाया...अपूर्ण...षडज के बिना शुरुआत नहीं होती...
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उसके चारों ओर निर्वात बन रहा था...खुद को महसूस करने के लिए उसने गहरी सांस ली...मगर जाने क्या था कि सांस लेने का भाव था मगर सांस जैसी कोई चीज़ उसे खुद के अन्दर महसूस नहीं हुयी...खुद के होने की जांच के लिए और बढ़ते निर्वात को रोकने के लिए उसे तीन कवितायें लगातार लिखनी पड़ी. खुले में होने के बावजूद उसे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे उसके इर्द गिर्द दबाव बढ़ता जा रहा है. क्या वो किसी ब्लैक होल में आ गयी थी? ब्लैक होल ग्रेविटी का सघन रूप होता है...उसने एक नाम पुकारने की कोशिश की...कहीं से कोई आवाज़ नहीं आई... आवाज़ की तरंगें दिख रही थीं मगर उसका नाम लौट कर नहीं आया.उसके नाम का पहला अक्षर बहुत उर्वर था...निर्वात में उस अक्षर की रोपनी होने से जमीन उगनी शुरू हो गयी. लड़की ने आवाज़ तरंग की लकीरों से कोपी के दो लाइन वाले पन्ने बनाने शुरू किये. तभी तरंगों का दूसरा हिस्सा जो था उसे लड़की के इरादों की भनक पड़ गयी. उसे लड़की की क्षमताओं का अंदाजा था. जैसे ही लड़की को लिखने भर का कागज़ मिलता वो उसपर एक नयी दुनिया बना कर खुद को उसका ईश्वर घोषित कर देती. इश्वर के खिलाफ गुरुत्वाकर्षण बल भी काम नहीं करता...भले ही वो एक छोटी दुनिया की ईश्वर हो...तरंग लड़की की बनायीं लकीरों के परपेन्डिकुलर लकीरें बनाने लगा. उसे पता था लड़की को मैथ से डर लगता है. उसे ये भी पता था कि संख्याएँ विभाजित करती हैं...शब्द जोड़ते हैं.
लड़की बनाना चाहती है एक पुल, कहानियों और सच्चाइयों के बीच... वो खोदना चाहती है एक वार्महोल सच और सपनों के बीच जिससे जब मन करे कुछ लोगों को इधर-उधर किया जा सके।वो कहानियों में जीवन भारती है और जीवन में कहानियां और ऐसा करने में वो खुद डूब जाती है अपने ही शब्दों के भंवर में।हर तरफ से कहानी दबोचती है उसे।उसके कागज़ पर फैली सियाही ही ग्रसती है उसे। उसके किरदार हर सांस उसे पुकारा करते हैं।वो रंगों, स्वरों,शब्दों के अजीब बवंडर में फंसी है... चक्रव्यूह। क्या रचना इतना मुस्किल होता है?
शब्द जोड़ते हैं।शब्द तोड़ते भी हैं।
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तुम्हे समझ आती है ये कहानी?
तुम्हे समझ आती है ये लड़की?
मुझे तो दोनों ही नहीं समझ आती...
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पहेली जिंदगी नहीं होती...हम हो जाते हैं. खुद से मिलते रहना जरूरी है. थोड़ा भाषण देना जरूरी है. बहुत दिन बाद लिखो तो बेहद फालतू चीज़ें लिखती हूँ...मगर बहुत दिन पहले एक दोस्त को कहा था...लिखने से मोह करना...लिखे हुए से नहीं. तो लिखने की आदत को बरकरार रखने के लिए इतना सारा कुछ.

Just loved it Naina. Its simply awesome like always.
ReplyDeleteThanks a lot :)
DeleteSimply awesome is ur presence and comment at my blog...