बचपन की बात ही आलग होती है.... किसी बात की कोई फिक्र ही नहीं होती !!!!!!!!!!! और तब बस एक ही धुन रहती है,,,,, कैसे स्कूल की छुट्टी हो की घर जाएँ और खूब धूम मचाएं ....पर आज जब छुट्टी मिलती है तब दुःख होता है.... तब library में बेठना बिलकुल पसंद नहीं था बस किताबिं के शौक में चले जाते थे पर आज तो library से निकालने का मन नहीं होता !!!! वक़्त इसमें बहुत ताकत होती है ..... ये हर चीज़ को अपने अनुसार ढाल ही लेता है.... वरना मुझ जैसी बददिमाग और बिगड़ी हुई लड़की कभी इतनी emotional बातें भी लिख सकती है... यकीं नहीं होता!!!!! घर पर सबके लाड- प्यार की आदत ने इतना बिगड़ दिया की बस अब लाख चाहूं की ये आँखे गीली न हों .... पर इस दिल की गहराई मई बसे ये रिश्ते ये नाते.... मुझसे छुटते ही नहीं!!!!! कुछ लिनेस अभी मन मैं आ रही है:--
"सफ़र हसीं जो लगे ... वो हमारा पथ नहीं... कांटो पर चलने का शौक तो नहीं था,,,, पर बस अब आदत सी हो चली है.... अपने बिगड़े दोस्तों के सामने बड़े घमंड से कहती थी की मुझे किसी चीज़ की आदत नहीं है पर आज जाना है मुझे एक बड़ी बुरी आदत है.... आदत रिश्तों की उनकी गरमाई की उनके प्यार की उनकी ममता की उनकी तड़प की उनसे दूर होने की चुभन की और ,,,, आप शायद थोडा हैरान होंगे ये जानकार की ... यही आदत,,, हर बुरी आदत को अपने पास बुला लेती है"............................................
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