;

Saturday, September 10, 2011

Tere Bin !!!

आज याद आ रही है
चूड़ियों की खनक
जब रोटियाँ  बनाते वक़्त तुम
बेलन चलाती  थी
एक लय थी उनमे
खन खन खन............

या देर रात जब देखने आती थी
की मैं सो गई हूँ
या अब तक पढ़ रही हूँ
चुपके से आने पर भी 
पायल धीरे से बोल ही देती थी...

सुबह जब तक तुम पांच बार 
आवाज़ नहीं लगाती थी
उठने का सवाल  ही नहीं होता था 
बिना डांट खाए 
रोटी गले से निचे नहीं उतरती थी.....

सुबह की पहली आरती के स्वर
राग, संख, दीप
सब तुमसे ही सीखा है 


आज  सुबह  उठती  हूँ....
अलार्म क्लोक पर तुम्हारी आवाज़ सेट है...
पर उसमे  वो बात नहीं!!!


मेरे स्वर अब बेरागी से लगते हैं,
संख में शोर और दीप में बस अग्नि दिखती है...
 वो आस्था अब खोयी से लगती है!!! 


बिना सोचे बस खाना निगल लेती हूँ
फिर याद आता है तुम  कैसे डांटती थी 
ऐसे हडबडी  के लिए!!!!


आजकल पूरी रात जगती हूँ...
ये सोचकर की तुम कभी देखने आओगी 
और तुम्हारी  पायल फिर बोलेंगी
पर पायल खामोश है!!!!!


कल मैं यूँ ही बेठी थी की
मेरी चूड़ी बोल उठी
मुझे लगा तुम आई हो...
तुम कहती हो ना
की एक वक़्त के बाद हर लड़की में
उसकी माँ का अक्श आ जाता है


बहुत खामोश हो गई हूँ
तुम बिन
आकर मेरे वजूद को शब्द दे दो!!!!
आ जाओ माँ!!!!


--10.09.2010--



1 comment:

  1. Its strange...
    I was nt aware dat tum Aunty ko itna Miss karti thi kol me... bcz dat tym all u used to say was for uncle...

    Poem is very tchng...

    loved dat lines related to sankh nd deep;
    मेरे स्वर अब बेरागी से लगते हैं,
    संख में शोर और दीप में बस अग्नि दिखती है...
    वो आस्था अब खोयी से लगती है!!!

    ReplyDelete

Translate