भटकना यादों के गाँव में।आवाज़ के एक धागे को थामे... खटखटाना सारे भिड़े दरवाज़े।झांकना अधखुले किंवारों के भीतर... नीम अँधेरे में उलझना रौशनी की आधी बुझती लकीर से... फिर भी थामे रखना उस आवाज़ को जिसने नहीं देखि मेरी आँखों में नींदें...
आवाज़ है या मखमली पैरहन... काँधे को छु चिनाब बहती है इसे... और मन में महासगार. जैसे गाँव की कोई कच्ची सी याद... धान की बाली सी तीखी काट... ऐसी जो दर्द देकर सुकून दे...
आवाज़ की खुलती परतों संग खिलखिलाती है लड़की, ठीक वैसे ही जब दाना देती है चिड़ियों को... पर बार-बार सुनने से घीस गई है आवाज़ वैसे ही जैसे पूर्णिमा के बाद वाला चाँद...
आवाज़ के कतरों को सहेजती है लड़की, थोड़ा-थोड़ा... उसी गुल्लक में, जिसमे जमा किए है उसने बचपन वाले सपने. आवाज़ है या कोई रूह घंटो भटकाती है लड़की को... लड़की भी ना जाने क्या पाती है? भटकन से।
आवाज़ की कतरों में बहती है लड़की। कभी ख्यालों में ढूँढती है आवाज़ का लिबास... वो छूती है आवाज़ को और आवाज़ उसे... अधिकतर होता यूँ है की ज़िन्दगी से लोग जुड़े होते हैं, इसलिए हम आवाज़ पहचानते हैं पर लड़की आवाज़ को जानती है पर उस से जुड़ा वो कैसा है नहीं मालुम।
ना जाने क्यों इस आवाज़ में अपना नाम सुन लड़की को ऐसा क्यों लगता है जैसे किसी ने पहली बार पुकारा है उसका नाम... ऐसा मानो अब से पहले उसका नाम बस एक संख्या थी। बायनरी डिजिट से बनी कोई अस्की कोड... ना जाने कैसे ये आवाज़ वो कुंजी ढुंड लायी मेरे नाम के उच्चारण वाली...
केमेस्ट्री के नियम समझा नहीं सकते की क्या बोंड है लड़की का उस आवाज़ से। फिजिक्स पीछे हट जाता है की ये क्या एनेर्जी कन्वर्शन है, जो भूख- प्यास मिट जाती है उसकी आवाज़ सुनने से ... खाए पिये बगैर भी दिन गुज़र जाता है
कभी सोचती हूँ तो लगता है की लड़की जिस आवाज़ के पीछे भागती है वो शायद उसकी खुद को ढूँढने की कोशिश है . लोग आइनों की तरह होते हैं...उनमें आपका खुद का अक्स दिखता है. तलाश एक ऐसे आईने कि है जिसमें अक्स धुंधला न दिखे. बस.
आह! जो जरा कच्ची सी फाँक मिल जाए मुझे इस आवाज़ की....
आवाज़ है या मखमली पैरहन... काँधे को छु चिनाब बहती है इसे... और मन में महासगार. जैसे गाँव की कोई कच्ची सी याद... धान की बाली सी तीखी काट... ऐसी जो दर्द देकर सुकून दे...
आवाज़ की खुलती परतों संग खिलखिलाती है लड़की, ठीक वैसे ही जब दाना देती है चिड़ियों को... पर बार-बार सुनने से घीस गई है आवाज़ वैसे ही जैसे पूर्णिमा के बाद वाला चाँद...
आवाज़ के कतरों को सहेजती है लड़की, थोड़ा-थोड़ा... उसी गुल्लक में, जिसमे जमा किए है उसने बचपन वाले सपने. आवाज़ है या कोई रूह घंटो भटकाती है लड़की को... लड़की भी ना जाने क्या पाती है? भटकन से।
आवाज़ की कतरों में बहती है लड़की। कभी ख्यालों में ढूँढती है आवाज़ का लिबास... वो छूती है आवाज़ को और आवाज़ उसे... अधिकतर होता यूँ है की ज़िन्दगी से लोग जुड़े होते हैं, इसलिए हम आवाज़ पहचानते हैं पर लड़की आवाज़ को जानती है पर उस से जुड़ा वो कैसा है नहीं मालुम।
ना जाने क्यों इस आवाज़ में अपना नाम सुन लड़की को ऐसा क्यों लगता है जैसे किसी ने पहली बार पुकारा है उसका नाम... ऐसा मानो अब से पहले उसका नाम बस एक संख्या थी। बायनरी डिजिट से बनी कोई अस्की कोड... ना जाने कैसे ये आवाज़ वो कुंजी ढुंड लायी मेरे नाम के उच्चारण वाली...
केमेस्ट्री के नियम समझा नहीं सकते की क्या बोंड है लड़की का उस आवाज़ से। फिजिक्स पीछे हट जाता है की ये क्या एनेर्जी कन्वर्शन है, जो भूख- प्यास मिट जाती है उसकी आवाज़ सुनने से ... खाए पिये बगैर भी दिन गुज़र जाता है
कभी सोचती हूँ तो लगता है की लड़की जिस आवाज़ के पीछे भागती है वो शायद उसकी खुद को ढूँढने की कोशिश है . लोग आइनों की तरह होते हैं...उनमें आपका खुद का अक्स दिखता है. तलाश एक ऐसे आईने कि है जिसमें अक्स धुंधला न दिखे. बस.
आह! जो जरा कच्ची सी फाँक मिल जाए मुझे इस आवाज़ की....
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