मन की कच्ची स्लेट पर लिखना है
आँखों के काजल से उसका नाम...
खुली हथेली पर खिंच दूंगी
उसके नाम वाली लकीरें...
फिर बंद कर दूंगी मुट्ठी
कहाँ छुट के जायेगा वो तब... बोलो?
जिस शाम आँखें बरसेंगी
किसी टकराहट के बाद...
धुप की चम्मच से मिला दूंगी,
ब्लैक काफ्फी में दो शुगर क्यूब प्यार...
सोचती हूँ पढ़ लूँ सारी किताबें
अभी की अभी...
फिर तो सारा वक़्त
एक दुसरे को ही पढना है... नहीं?
लिख दूँ वो सबकुछ जो सुन्दर लगे...
क्या पता जो हुई उसकी आँखें इतनी दिलफरेब ...
की बस उसकी ही तारीफ
लिख सकें फिर मेरी कलम...
सोचती हूँ...
की कभी फ़ोन पर
जो साथ चलने
एक दूर खुले रस्ते पे
जहाँ से वापस आने का कोई आप्शन न हो...
क्या निकल पाऊँगी मैं
उस ख्वाब से... कभी भी?
बातें बहुत सी हैं...
उतने ही ख्वाब भी...
चुटकी भर इच्छाएँ...
थोड़ी सी सोच भी...
मुझे नहीं पता की
वो कैसा होगा?
पर इतना "यकीन" है
की वो मेरा होगा...
जो मेरा होगा...

No comments:
Post a Comment